Saturday, January 30, 2010

चंद शेयर

ज़िकर दर्द का मैं ,कैसे कर दूँ !
जान , लफ्ज़ों के हवाले कर दूँ !

मैं कोई पीर ,पैगम्बर तो नहीं ,
जो सर काट , हथेली पे धर दूँ !

ह़क नमक का, अदा करते हैं ,
कैसे अश्कों मे, मिश्री भर दूँ !

जा पहुँचे ,जो तेरे ख्यालों तक ,
बता याद को , कोन से पर दूँ !

4 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

बढिया; ये शेर है या शेयर ?


आरंभ

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया!

निर्मला कपिला said...

इश्तिहारों के इस मेले में ,
कब तक यूँ ही चिल्लाएगा ,
कभी ना ख़तम होने वाला ,
लम्बा सवाल ..........शायद ,
कभी हल ना कर पायेगा !ेक एक शब्द मर्मस्पर्शी भाव लिये हुये है सही मे हम लोग कभी इस राजनीति के खेल से उभर नही पायेंगे शुभकामनायें

निर्मला कपिला said...

ज़िकर दर्द का मैं ,कैसे कर दूँ !
जान , लफ्ज़ों के हवाले कर दूँ !

मैं कोई पीर ,पैगम्बर तो नहीं ,
जो सर काट , हथेली पे धर दूँ !
वाह लाजवाब शेर हैं शुभकामनायें