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Tuesday, February 16, 2010

ग़ज़ल


दिल को , दस्तक देता रहता ,
धुन्दला ,धुन्दला एक फ़साना !

ख्वावों में है , एक ही मंज़र ,
उसका आना , उसका जाना !

हंसता गुल ,समझाए सबको ,
सच है , कल मेरा मुरझाना !

राह बदल लेता है , अक्सर ,
सीधा चला , कब ये ज़माना !

फूल खिला तो , लाश मिली ,
मुबारक , भंवरे का मर जाना !

कैसे रुके दिल, जब रोना चाहे,
यादें तो हैं, बस फ़कत बहाना !

"कुरालीया " दिल दरिया जैसा ,
डूबना लाजिम , सबने माना !

Monday, February 8, 2010

ग़ज़ल


पहले नहीं हम लुटने वाले ,आँखों के बाज़ार में !
जाने कितने टकरायें अभी , शीशे की दीवार में !

ख़त पढ़ते ही रो देंगे वो ,ऐसा तो गुमां ना था ,
तौबा कितना दम होता है , कागज़ की कटार में !

निसार उनपे क्या किया ,शायद कुछ हिसाब लगे ,
पाना तो होता ही नहीं , दिल के अंधे व्योपार में !

दर्दे बयां भी कर देंगे , कुछ बज़्मे रौनक बढ़ने दो ,
आखिर हंसी उड़ायें क्यूँ , हम अपनी दो चार में !

मेरा बुलाना , तेरा जाना , दोनों बातें तय हैं अब ,
"कुरालीया "वकत गंवाए क्यूँ , वादों की तकरार में !

Tuesday, January 19, 2010

ग़ज़ल




ये इश्क का अजगर ,निगल गया लाखों ,
मगर , कमी न आयी , कहीं दीवानों मे !

बिन जले समझा है ,न कोई समझेगा ,
कैसा जनून है , मरने का परवानो मे !

अजब ये आग है ठंडी, धुआं नहीं करती ,
मज़ा आता है बस , जलने जलाने मे !

बीमारे इशक को, दरवेश कहूं या दीवाना ,
शिवरी को उम्र लगी , बेर खिलाने मे !

कहीं 'शिव' को लगाता है, रोग विरहा का ,
सयाही दर्द की, भरता है कलमदानों मे !


कच्चे घड़े की , कश्ती पे तेरता है कहीं,
दफ़न होता है कहीं , रेत के तूफानों मे !

'कुरालीया' बस, इतना ही समझ पाया ,
मिटता रहा है , महबूब को मनाने मे !

Monday, January 18, 2010

ग़ज़ल


हर हालात को , पुख्ता हल की ज़रुरत है !
फ़ेसला तय है , क्या कल की ज़रुरत है !

तंगिए दौर , पुर जोर बुलंदी पे है इब्ला ,
आवाम को , बस हलचल की ज़रुरत है !

इल्म भरपूर है सबको, अमल से परहेज़,
मशरूफ नज़रों को ,फुर्सत की ज़रुरत है !
दीवानगी आज भी , कम नहीं है लैला की ,
जो पहुँचे दिल तक ,उस कद की ज़रुरत है !

रहवर खुद भटके हुए , रास्ता बता रहे हैं ,
जो रौशनी बक्शे , मुर्शद की ज़रुरत है !

हर फेसला कल पे , क्यूँ टाला जा रहा ?
'कुरालीया ' किस कल की ज़रुरत है !

Friday, January 15, 2010

ग़ज़ल


शायद कोई, दोस्त मिल जाये कहीं ,
रकीबों से भी, हाथ मिलाने लगा हूँ !

गुलों की चाल से , वाकिफ हूँ अब ,
गुलदानों में , कांटे सजाने लगा हूँ !

हर सवाल पे ,खामोश मुस्कुराता हूँ !
ढंग दुनियां का , आजमाने लगा हूँ !

दिल के धोखे , मैं अब नहीं खाता ,
हर एक चोट पे , गुनगुनाने लगा हूँ !

फरेब आखिर , सिखा दिया मुझको ,
अश्कों को , तिनका बताने लगा हूँ !









Friday, January 1, 2010

ग़ज़ल


ये बात झूठ है, कि सब झूठ है ज़माने में !
नहीं फरेब , किसी बच्चे के मुस्कुराने में !!

क्या कभी चाँद भी रूठता है , कहीं सूरज से,
फासला तय ही सही , दोनों के आने जाने में!

आराम खुद ही , सदा दिल को गुदगुदायेगा ,
लगा समय , किसी बजुर्ग के पांव दबाने में !

समझ पैगाम , महोब्बत का नाम है देना ,
फलों का मोल छिपा ,शाख के झुक जाने में !

'कुरालीया ' सब कुछ ,बिखर ना जाये कही ,
लगा ना देर किसी, रूठे को कभी मनाने में !


Friday, December 25, 2009

ग़ज़ल


रात इक ख़्वाब ने , फिर हमको जगाया रात भर !
सिसकियाँ बन के, तमाशाई ने हंसाया रात भर !!

दे गया ज़हन को , यूँ बिछड़ी हुयी यादों का भंवर ,
मैं ढूंढ़ता ही रह गया , ना लौट के आया रात भर !

ये तो तय है कोई, अपना ही था जगाने वाला ,
ना जाने कितनी ही ,शक्लों से मिलाया रात भर !


Wednesday, December 23, 2009

अपने प्यारे पिता....स्वर्गीय श्री संत राम जी को समर्पित



अपनी सूरत मैं तेरी, सूरत नज़र आती है !
आईना धुंधलाता है,आँख छलक आती है !


रात को पेट पे, लेटते हुए ही सो जाना,
कभी वो, पीठ की सवारी याद आती है !

हर बात मैं, बस रंग तेरा ही तलाशता हूँ
हर आदत मैं, तेरी आदत झलक जाती है !

तेरे होते, किसी दोस्त की कमीं ना थी,
दोस्ती हर दोस्त की, तंग नज़र आती है !

शाख से टूटे, किसी पत्ते को सहला लेता हूँ,
रूह जब भी ,तेरी याद में विल्विलाती है !

पलंग बजा कर , वो धीरे से गजल गाना ,
आवाज़ आज भी, कानों को छू जाती है !

खाली जेब से , भर कर मुट्ठी निकालना ,
आज इतनी है, दौलत, गिनीं ना जाती है !

सब्र से बढ़ कर, नहीं दौलत कोइ ज़माने मैं ,
आज भी बाद तेरे, ये बात काम आती है !

श्री 'संत 'के संग राम हो तो क्या कहना ,
हरेक सांस मैं, इक आह सी भर आती है !
'संजीव कुरालिया'



Tuesday, December 22, 2009

ग़ज़ल



मौला दर्द ज़माने भर का, ग़र मुझको मिल जाये तो ,
क्या बिगड़ेगा तेरा या रब, हर चेहरा खिल जाये तो !

लाशें खा खा थक गई होगी, ये धरती बहुत पुरानी है,
हर रिश्ते को जीने का, अंदाज़ नया मिल जाये तो !!

रंगों का बाज़ार ये दुनिया , न जाने क्यूँ वीरान लगे ,
बे रंग ख्यालों से आलम ,निजात जरा सी पाए तो !

न शाख से पत्ता बिछड़े , न आंधी तोड़े डाल कोई ,
मुरझाये हर गुल को , खोयी महक मिल जाये तो !

सदियों पुराने खेल घिनोने , ज़ात मज़हब दोहराए न,
दर्द बेगाना जाने ऐसा , दिल सबको मिल जाये तो !

दर्द दिलों में रहे न बाकी , न आँख कहीं नमी खाए ,
गम खा के हंसने वालों को, थोड़ी ज़ुबा मिल जाये तो !

बेबसी 'कुरालिया' बयाँ करे , क्यूँ सबका यूँ दर्द सहे ,
मौला तेरी रहमत सबको , इक जैसी मिल जाये तो!